इंडियन साइंस कांग्रेस और जिन्नों से बिज़ली पैदा करने का नुस्ख़ाः ब्लॉग

पिछले पांच दिन से मैं अपने बचपन के दोस्त असलम उस्ताद को बुरी तरह से याद कर रहा हूं.

उस्ताद असलम का इंतकाल छह बरस पहले हुआ. उनका विज़िटिंग कार्ड आज भी मेरे सामने है जिसमें लिखा है - मोहम्मद असलम ख़ान, एमएससी (फ़िजिक्स) गोल्ड मेडलिस्ट.

असलम उस्ताद 25 बरस तक एक कॉलेज में फ़िजिक्स पढ़ाते रहे. फिर एक दिन जानें क्या सूझी कि नौकरी छोड़-छाड़ दाढ़ी बढ़ा ली और अपना क्लीनिक खोल लिया.

यहां वो सुगर और कैंसर का इलाज़ दवा से नहीं दुआ से करते थे. मगर अक्सर मरीज़ एक बारी के बाद पलटकर नहीं आते थे.

उस्ताद असलम ने घर में ही अपनी छोटी सी लैब भी बना ली थी जिसमें वह जिन्नों से बिजली पैदा करने की कोशिश करते थे.

उनकी थ्योरी ये थी कि चूंकि जिन्न एनर्जी से बने होते हैं तो अगर उनको काबू में कर लिया जाए तो उनसे बिजली पैदा करके पाकिस्तान की लोड शेडिंग ख़त्म हो सकती है.

कभी असलम उस्ताद, हम जैसे जाहिलों को तफ़्सील से बताते थे कि इस्लामी किताबों में जिस जुल्करनैन बादशाह का ज़िक्र है, उसके पास शीशे का ऐसा प्याला था जिसमें पूरी दुनिया नज़र आती थी.

इसका मतलब है कि जुल्करनैन पहला बादशाह था जिसके पास तीन हज़ार साल पहले भी इंटरनेट था.

एक दिन उस्ताद असलम ने पूछा कि तुम बड़े ज्ञानी बने फिरते हो, ये बताओ कि इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर बिन ख़त्ताब 14 सौ साल पहले डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर मदीने में बैठकर ईरानियों के साथ चल रहे कात्सिया के युद्ध में अपने कमांडर को कैसे गाइड कर रहे थे.

ज़ाहिर है कि ऐसा मोबाइल टेक्नोलॉजी के बगैर संभव नहीं हो सकता.

रात को मैं जालंधर में होने वाली 106वीं इंडियन साइंस कॉन्ग्रेस का हाल पढ़ रहा था जिसमें आंध्र यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर नागेश्वर राव जी ने अपने पेपर में साबित किया कि विष्णु भगवान के पास जो सुदर्शन चक्र था वो अपने टारगेट को तबाह करके वापस आ जाता था. इसका मतलब ये है कि भारत में लाखों वर्ष पहले भी गाइडेड मिसाइल तकनीक मौजूद थी.

उन्होंने कहा कि रावण के पास बस एक पुष्पक विमान ही नहीं. बल्कि 24 दूसरे विमान भी थे और लंका में कई हवाई अड्डे भी थे. और गांधारी ने सैकड़ों कौरवों को जन्म दिया था जिसका मतलब है कि कौरव-पांडवों के जमाने में भी भारत में स्टेम सेल टेक्नोलॉजी और टेस्ट ट्यूब बेबी का तरीका इस्तेमाल हो रहा था. वरना एक औरत सैकड़ों बच्चों को कैसे जन्म दे सकती है.

काश, उस्ताद असलम आज ज़िंदा होते तो वो भी किसी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर होते और आंध्र यूनिवर्सिटी के नागेश्वर राव की तरह वाह-वाह समेट रहे होते.

जब उस्ताद असलम के ज्ञान की कद्र का ज़माना शुरू हुआ तो वो इस दुनिया से ही चले गए.

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